राजू और काजू

                              राजू और काजू
        
                                              -डॉ0 साधना अडवानी

छुक छुक छुक करके चलती रेल।
कभी ठहरती कभी चलती रेल।।

खिड़की के पास बैठा था राजू।
सटकर बैठी थी उसकी बहन काजू।।

तभी चने मुरमुरे वाले ने चिल्लाया।
मूँगफली वाला भी तभी चला आया।।

खाने की चीज़ें देख मचलने लगा राजू।
न ही कम थी बहन काजू।।

दोनों ने दो-दो पुड़िया बनवाईं।
मूँगफली खुश होकर खाई।।

फिर आया गरम समोसे वाला।
आया साथ में केले फलवाला।।

देख समोसे और केले।
दोनों ने फिर से धूम मचाई।।

माता-पिता ने मना किया।
पर आफत थी उन्होंने मचाई।।

केले और समोसे खाए।
फिर भी भूख से तरसाए।।

कोल्ड ड्रिंक वाले की पुकार सुन।
खुश हुए बहूत ही मन ही मन।।

बिना अनुमति की आवश्यकता जान।
ठंडक पाकर छेड़ दी होंठों पर मुस्कान।।

चलती ट्रेन की खड़खड़-खड़-खड़।
मचने लगी पेट में गुड़गुड़-गुड़-गुड़।।

माँ ने जब दवा पिलाई।
तब जाकर राहत पाई।।

बच्चों ने किया माता-पिता से ये वादा।
ज़िद करके खाएँगे ना कभी ज्यादा।।


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